सभा में सन्नाटा था। निनाद बेडेकर जी बोल रहे थे — लेकिन उनके शब्द इतिहास नहीं, बल्कि तिल-तिल जलती हुई एक पीड़ा थी . उन्होंने कहना शुरू किया — "औरंगज़ेब से पहले भी एक परंपरा चल रही थी — मुंडक्यांचे मिनार की। यानी इंसानों के कटे हुए सिरों के स्तंभ। लड़ाई के बाद जब सिर काटे जाते, तो उनसे मीनार बनाई जाती थी। औरंगज़ेब दरबार में पूछता था - ‘मुंडक्यांचा मिनार झाला का?’ यानी क्या सिरों का मीनार बनाया गया या नहीं?” यह कल्पना नहीं थी। ऐसे चित्र और दस्तावेज़ आज भी मौजूद हैं जो इन नरसंहारों की गवाही देते हैं। इन अत्याचारों का उद्देश्य स्पष्ट था — डर फैलाना, धर्मांतरण थोपना, और हिंदू मन को कुचल देना। फिर बेडेकर जी ने एक और अमानवीय घटना सुनाई — "एक व्यक्ति को पकड़कर उसके गुदद्वार में लोहे की सलाई डाली गई, फिर जब तक वह तड़पता रहा, उस पर वार होते रहे। वह जानवर की तरह चिल्लाता रहा। फिर उसकी आवाज़ बंद हो गई। जब सलाई निकाली गई — तो वह मर चुका था।" यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि यूरोपीय यात्रियों द्वारा लिखित दस्तावेज़ों में दर्ज ऐतिहासिक सत्य है। 🔻 और यही अत्याचार देखकर एक वीर आत्मा का हृदय...
I am Pavan Pinate, a descendant of the Hindu Civilizational Battle—not by bloodline alone , but through awakened consciousness. Former ABVP Karyakarta and lifelong activist committed to nurturing and protecting Bharat’s rich cultural legacy. As an entrepreneur, my mission is to shape Bharat's future grounded firmly in its eternal values: Dharma, integrity, and resilience. Let's connect, collaborate, and create together.